Wednesday, October 26, 2011

सब मुझमे ही है |


कभी भरा सियाही से मैं, कभी मैं कागज़ कोरा हूँ

कभी हरा हरियाली सा मैं, कभी रेट का टीला हूँ

कभी बरसता नीर गगन से मैं, कभी नयन मैं गीला हूँ

कभी हूँ तिनका आँखों का मैं, कभी आँख का तारा हूँ



कभी सुहागन की मधुर बेला मैं, कभी विधवा का चोला हूँ,

कभी मधु की शुद्ध मिठास मैं, कभी मैं विष का घोला हूँ,

कभी कोलाहल कोयल का मैं, कभी मैं क्रंदन बोला हूँ,

कभी हूँ अंतिम छंद कवी का, कभी प्रथम प्रेम सा भोला हूँ


कभी फूल हूँ कोमल सा मैं, कभी मैं शूल कुटिल सा हूँ,

कभी सत्य हूँ निर्मल सा मैं, कभी मैं झूंठ शिथिल सा हूँ,

कभी विश्वास अडिग सा मैं, कभी मिथ्या चोटिल सा हूँ,

कभी हूँ मंथन मंथरा का, कभी सरल मिथिल सा हूँ


मुझमे राम है मुझमे ही रावन, मुझमे श्याम है मुझमे ही कंस

स्थिरता है मुझमे और है कम्पन, निर्माण है मुझमे और है विध्वंस

मैं गाँधी मैं जिन्नाह हूँ, मैं गाँधी मैं अन्ना हूँ,

जितना झाँका अन्दर खुद के, सोचा कितना नंगा हूँ

Monday, October 17, 2011

लाल काग़ज़

दिल की तसवीरें कागज़ पर उतारते उम्र गुज़र गयी,

लिखना सीखा ही था मैने अौर सियाही बिखर गई |


हाथ की उंगलियाँ अब जवाब दे चुकी दिल में आहें बची हैं

मंजिल के कारवां कब के लुट चुके अब सिर्फ राहें बची हैं |