Saturday, September 1, 2012

तब मैं तुम्हारे साथ होता हूँ....



जब मैं भूल जाता हूँ पढ़ते हुऐ कुछ पंक्तियाँ पढना और समझना  
जाने कब वो पंक्तियाँ धुंधली हो मेरी आँखों में खो सी जाती हैं.. 

भूल जाता हूँ मैं सारा गुणा भाग घटा जोड़ और क्षेत्रफल की गणना 
हिसाब वो बेहिसाब और छोटा सा एक पल अविरल सा लगता है... 

देखते देखते जब आँखें झपकना छोड़ कर एकटक मेरे मन का साथ देती हैं 
कुछ भी गुज़रे सामने से किन्तु आँखें चुम्बक सी एक ओर चिपकी रहती हैं...  

बिन कुछ कहे मन की दर्पण जीव्हा अन्दर सम्मोहक सी बातें करती हैं
फुसफुसा अन्दर जब एक अधर को वो दूसरे से अलग कर खिला देती है... 

बिना किसी स्पर्श आत्मा के रोम रोम में एक मधुर सा अनुभव होता है  
बिन बाग़ फूल और बिना भ्रमर के मन एक मधु रस में सराबोर होता है ...

तब शांत से एक क्षण में अधीर चित्त कानों में तुम्हारी आवाज़ घोल देता है 
तब बहाना पा मन का कण कण कल्लोल कर एक कोलाहल सा कर देता है....

तब मैं तुम्हारे साथ होता हूँ स्थिर रह कर मन की स्थिरता खोता हूँ
बिना किसी नाव के बिना पतवार बिना नदी के अपनी नैया खेता हूँ 
सोचता हूँ क्यों... क्यों नहीं कहा तुमसे जी भर के मैं तुमसे प्रेम करता हूँ.... 
सोचता हूँ क्यों... क्यों नहीं कहा तुमसे जी भर के मैं तुमसे प्रेम करता हूँ....


Saturday, January 7, 2012

JUGNU


पूनम की रात, चाँद ,उसकी कीमत ..कोई मुझसे पूछे

मैं अमावस का जलता हुआ एक आवारा जुगनू हूँ |

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ढूंढते रहते हो तुम.. ज़िन्दगी को; महताब में, सितारों में

क्या लगता है... खुदा ने जुगनू को यूं ही बनाया है |

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मेरा दिल तो जुगनू है ,जिस रात भी तेरे दर पे ठहरेगा

वो ..अमावस की रात क्यों हो ,क़यामत हो जायेगी |

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कौन कहता है मुहब्बत में गज़ब की कशिश नहीं

कौन कहता है मुहब्बत गज़ब की आतिश नहीं

मैं तो अब तक जल रहा हूँ इस आग में ,गौर से देख

यूं ही लोग नहीं पुकारा करते मुझे जुगनू के नाम से |

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बे फजूल में चाहती है चाँद सितारों को, बहुत दूर हैं वो

कभी पा सकेगी, यह चाहत, चाहत ही रह जायेगी |

जो तुम्हारे गुलशन में फिरता रहता है टिमटिमाता हुआ

कभी उस जुगनू को देख छुप के मुलाकातें दो चार करो |

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सदा की आवाज़ बन के सही, वादा है तुझ तक पहुंचूंगा ज़रूर

कहते हैं जुगनू की चमक ए फ़िक्र दूर से दिख जाया करती है |

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कर लो मुझे इकठ्ठा अपनी मुट्ठी में देर तलक

जुगनू हूँ मैं चराग का सा असर छोड़ जाऊँगा |

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Wednesday, October 26, 2011

सब मुझमे ही है |


कभी भरा सियाही से मैं, कभी मैं कागज़ कोरा हूँ

कभी हरा हरियाली सा मैं, कभी रेट का टीला हूँ

कभी बरसता नीर गगन से मैं, कभी नयन मैं गीला हूँ

कभी हूँ तिनका आँखों का मैं, कभी आँख का तारा हूँ



कभी सुहागन की मधुर बेला मैं, कभी विधवा का चोला हूँ,

कभी मधु की शुद्ध मिठास मैं, कभी मैं विष का घोला हूँ,

कभी कोलाहल कोयल का मैं, कभी मैं क्रंदन बोला हूँ,

कभी हूँ अंतिम छंद कवी का, कभी प्रथम प्रेम सा भोला हूँ


कभी फूल हूँ कोमल सा मैं, कभी मैं शूल कुटिल सा हूँ,

कभी सत्य हूँ निर्मल सा मैं, कभी मैं झूंठ शिथिल सा हूँ,

कभी विश्वास अडिग सा मैं, कभी मिथ्या चोटिल सा हूँ,

कभी हूँ मंथन मंथरा का, कभी सरल मिथिल सा हूँ


मुझमे राम है मुझमे ही रावन, मुझमे श्याम है मुझमे ही कंस

स्थिरता है मुझमे और है कम्पन, निर्माण है मुझमे और है विध्वंस

मैं गाँधी मैं जिन्नाह हूँ, मैं गाँधी मैं अन्ना हूँ,

जितना झाँका अन्दर खुद के, सोचा कितना नंगा हूँ

Monday, October 17, 2011

लाल काग़ज़

दिल की तसवीरें कागज़ पर उतारते उम्र गुज़र गयी,

लिखना सीखा ही था मैने अौर सियाही बिखर गई |


हाथ की उंगलियाँ अब जवाब दे चुकी दिल में आहें बची हैं

मंजिल के कारवां कब के लुट चुके अब सिर्फ राहें बची हैं |