Saturday, September 1, 2012

तब मैं तुम्हारे साथ होता हूँ....



जब मैं भूल जाता हूँ पढ़ते हुऐ कुछ पंक्तियाँ पढना और समझना  
जाने कब वो पंक्तियाँ धुंधली हो मेरी आँखों में खो सी जाती हैं.. 

भूल जाता हूँ मैं सारा गुणा भाग घटा जोड़ और क्षेत्रफल की गणना 
हिसाब वो बेहिसाब और छोटा सा एक पल अविरल सा लगता है... 

देखते देखते जब आँखें झपकना छोड़ कर एकटक मेरे मन का साथ देती हैं 
कुछ भी गुज़रे सामने से किन्तु आँखें चुम्बक सी एक ओर चिपकी रहती हैं...  

बिन कुछ कहे मन की दर्पण जीव्हा अन्दर सम्मोहक सी बातें करती हैं
फुसफुसा अन्दर जब एक अधर को वो दूसरे से अलग कर खिला देती है... 

बिना किसी स्पर्श आत्मा के रोम रोम में एक मधुर सा अनुभव होता है  
बिन बाग़ फूल और बिना भ्रमर के मन एक मधु रस में सराबोर होता है ...

तब शांत से एक क्षण में अधीर चित्त कानों में तुम्हारी आवाज़ घोल देता है 
तब बहाना पा मन का कण कण कल्लोल कर एक कोलाहल सा कर देता है....

तब मैं तुम्हारे साथ होता हूँ स्थिर रह कर मन की स्थिरता खोता हूँ
बिना किसी नाव के बिना पतवार बिना नदी के अपनी नैया खेता हूँ 
सोचता हूँ क्यों... क्यों नहीं कहा तुमसे जी भर के मैं तुमसे प्रेम करता हूँ.... 
सोचता हूँ क्यों... क्यों नहीं कहा तुमसे जी भर के मैं तुमसे प्रेम करता हूँ....


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